सोमवार, 26 जुलाई 2021

18 बरस का कुक्कू

 


प्रिय बेटे कुक्कू। सदा खुश रहो। खूब तरक्की करो। आज तुम 18 वर्ष को हो गये हो। इस उम्र का मतलब समझते हो। अब वह बैंक अकाउंट सिर्फ तुम्हारे नाम होगा जिसको अब तक आपकी मम्मा ऑपरेट करती थीं। वोटर कार्ड तुम्हारे नाम से बनेगा। यानी अब तुम वोटर बन जाओगे। और भी कई बदलाव होंगे और सबसे बड़ी बात कि अब तुम कॉलेज लाइफ में प्रवेश करोगे जहां तुम्हारा वास्ता बहुत अलग तरह की दुनिया से पड़ेगा। उस दुनिया से तालमेल बिठाते हुए जहां तुम्हारी नजर भविष्य पर अपने लक्ष्य पर होगी, वहीं कॉलेज लाइफ को एंजॉय भी करना होगा।

यह बर्थडे वास्तव में खास है, लेकिन इस खास में कोरोना महामारी का फीकापन सवार हो गया। नहीं तो इस वक्त शायद तुम नये संस्थान में एडमिशन लेने की जद्दोजहद में होते या शायद एडमिशन हो चुका होता। खैर कोई बात नहीं। सब समय का फेर है। इसी तरह आज के दिन मेरे और तुम्हारी मम्मा के भी बहुत कुछ करने के अरमान थे। जैसे सुबह पूजा-पाठ, फिर कहीं घूमने का कार्यक्रम। शाम को बर्थडे सेलिब्रेशन आदि। पूजा-पाठ नातक (प्रमोद का बेटा हुआ है, शुभ सूचना है। नातक में सूखी पूजा होगी) के कारण विस्तार से नहीं होगी। कुछ पकवान तो बनेंगे ही। बाकी कुछ न भी हो पाये तो भावना तो बहुत कुछ करने की है ही। कार्तिक तुमसे बेटा कुछ भी नहीं छिपा है। आर्थिक स्थिति से लेकर, सामाजिक व पारिवारिक। बस बेटा, इतना ध्यान रखना बड़ों का सम्मान करना। छोटों को प्यार देना। दोस्ती परखकर करना। बात सबसे करना, लेकिन जहां तुम्हें कुछ अटपटा लगे, खुद ही किनारे हो जाना। वैसे मैंने देखा है कि संगति के मामले में तुम्हारा चयन ठीक रहता है। अब एक बड़ा काम तुमको वैक्सीन लगाने का है। देखते हैं कब लग पाती है। जेईई एडवांस का पेपर देने के बाद जरूर तीन-चार दिन घूमने चलेंगे ताकि रिलैक्स होकर नयी शुरुआत कर सको। अपनी एक कविता के साथ तुम्हें फिर से ढेर सारी बधाइयां, शुभकामनाएं।

तुम बालिग हो गये हो तो क्या

हो तो जिगर के टुकड़े।

जिगर बड़ा नहीं होता

पर उसके बगैर

काम भी तो नहीं चलता।

जीवन की गति की मानिंद

अब तुम पकड़ोगे रफ्तार

रफ्तार पर नियंत्रण भी होगा रखना

हां, यही तो मेरा है कहना

अपना ध्यान तुम अब ज्यादा रखना।

बहुत कुछ तो सीखता हूं तुमसे

इस सिखाने को जारी रखना

नयी खोजों पर तुम्हारे ज्ञान का हूं कायल

हां जीवन की सीख तुम मुझसे लेते रहना।

केवल की भावना को तुम समझते रहना

धवल के पथ पर भी अनुभव बिखेरना।

ताऊ-ताई, बुआ-फूफा सबको प्रणाम करना

दद्दा, दीदी को भी बातें बताते रहना।

बहुत हुए उपदेश चलो अब आगे चलें

आओ बालिग कुक्कू का बर्थडे एंजॉय करें।

तुम्हारा पापा

केवल तिवारी

गुरुवार, 15 जुलाई 2021

कोरोना काल में एक दूसरे की मदद को प्रेरित करता हरेला त्योहार

सुख समृद्धि की कामना का पर्व हरेला


ऋतु खंडूरी

विधायक, यमकेश्वर- उत्तराखंड

हरेला। यानी हर्याव। सुख समृद्धि की कामना का पर्व। दूसरों को आशीवर्चन देने का पर्व। खिलखिलाने का पर्व। दूसरों को खुश देखकर खुद खुश होने का पर्व। ऐसे ही तो कई संदेश छिपे हैं उत्तराखंड के लोकपर्व हरेला में। इसे स्थानीय बोली में हर्याव भी कहते हैं। मूलत: कुमाऊं क्षेत्र में मनाये जाने वाला यह पर्व आज विश्वव्यापी है। यूं तो साल में तीन बार हरेला पर्व मनाया जाता है, लेकिन सावन मास की शुरुआत में मनाये जाने वाले इस पर्व का विशेष महत्व है। सावन यानी हरियाली की शुरुआत। हरियाली यानी सुख-समृद्धि। इस शुरुआत पर हरेला का त्योहार मनाकर हम जहां अपने परिवेश में खुशहाली की कामना करते हैं, वहीं दूर देश में जा बसे अपने अपनों की भी समृद्धि के लिए प्रार्थना करते हैं। बहनें चहकती हैं कि भाई को आशीर्वचन स्वरूप हरेला लगाएंगे यानी उनके सिर पर उन पौधों को रखेंगे जो उन्होंने कुछ दिन पहले बोये थे और आज (सावन माह की पहली तिथि) को काटकर उनकी पूजा-अर्चना कर अब सिर में रखने के लिए बड़े जतन से पूजा की थाल में रखे हैं। माएं अपने बच्चों के सिर पर भी इस हरेला को रखती हैं और ढेरों आशीर्वाद देती हैं। हरेला लगाते वक्त यानी हरेले को सिर पर आशीर्वाद स्वरूप रखते हुए कहा जाता है-

जी रया जागि रया, यो दिन यो मास भेंटने रया दुब जस पनपी जाया,

आकाश जस उच्च, धरती जस चकाव है जाया, सिंह तराण, स्याव जस बुद्धि हो,

हिमाव में ह्ंयू रुण तलक गंग-जमुन में पाणि रुण तलक जी रया जागि रया।

यानी लंबी उम्र की कामना। दूब की तरह पनपते रहने का आशीर्वाद। शरीर सौष्ठव, लंबी उम्र का आशीर्वाद।

कोरोना के इस कालखंड में हम सब लोगों को एक-दूसरे की मदद तो करनी ही है, एक दूसरे के लिए ऐसी ही कामनाएं भी करनी हैं तभी हम इस महामारी से पार पा पाएंगे। असल में हरेला का त्योहार हमें साथ-साथ बने रहने की सीख देता है। साथ-साथ मन से। दूर देश में भी कोई व्यक्ति है तो उसके लिए भी मन से कामना। कई घरों में जो बच्चे बाहर रहते हैं, उनके नाम से भी पूजा की जाती है।

उत्तराखण्ड के कई पर्व हैं जिनमें खेती-बाड़ी पशुपालन का भाव होता है। लोक में व्याप्त इस महत्वपूर्ण अवधारणा को धरातल में साकार रूप प्रदान करने की दृष्टि से ही सम्भवतः हरेला पर्व मनाने की परंपरा सदियों से चली आ रही है। हरेला जैसा पर्व ही अनेक जगह नवरात्र के समय भी मनाया जाता है। यूं भी इन दिनों भी एक नवरात्र चल रही हैं जिन्हें गुप्त नवरात्र कहा जाता है। उमंग और उत्साह के साथ मनाये जाने वाले इस ऋतु पर्व का विशेष महत्व है।

कब होती है शुरुआत

कुमाऊं अंचल में हरेला पर्व सावन मास के प्रथम दिन मनाया जाता है। बता दें कि उत्तराखंड में सौरपक्षीय पंचांग का चलन होने से ही यहां संक्रांति से नए माह की शुरुआत मानी जाती है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है कि हरेला साल में तीन बार मनाया जाता है, लेकिन विशेष महत्व सावन वाले हरेला का ही है। परम्परा के अनुसार हरेला पर्व से नौ अथवा दस दिन पूर्व पत्तों से बने दोने या रिंगाल की टोकरियों में हरेला बोया जाता है। इनमें पांच, सात अथवा नौ प्रकार के धान्य जैसे कि-धान, मक्का, तिल, उरद, गहत,  भट्ट, जौं सरसों के बीजों को बोया जाता है। घर के मंदिर में रखकर इन टोकरियां को रोज सबेरे पूजा करते समय जल के छींटां से सींचा जाता है। दो-तीन दिनों में ये बीज अंकुरित होकर हरेले तक सात-आठ इंच लम्बे तृण का आकार पा लेते हैं। हरेला पर्व की पूर्व सन्ध्या पर इन तृणों की लकड़ी की पतली टहनी से गुड़ाई करने के बाद इनका विधिवत पूजन किया जाता है। जन मान्यतानुसार हिमालय के कैलाश पर्वत में शिव पार्वती का वास माना जाता है।  इस धारणा के कारण हरेले से एक दिन पहले कुछ इलाकों में शिव परिवार की मूर्तियां भी बनाने की परम्परा दिखती हैं। इन मूर्तियां को यहां डिकारे कहा जाता है।

आज के दौर में अपनी मान्यताओं और परंपराओं के गूढ़ रहस्य को और भी समझना आवश्यक है। पहले सावन मास से ही चातुर्मास शुरू हो जाता है, इसमें यात्राओं पर तो प्रतिबंध होता ही था, तामसिक चीजों के सेवन पर भी रोक थी। आज इन बातों का वैज्ञानिक आधार भी है। इसलिए परंपराओं के वैज्ञानिक आधार को समझिए। त्योहार के मर्म को समझते हुए आइये इस पवित्र त्योहार पर हम सभी मिलकर सबकी खुशहाली की कामना करें और दुआ करें कि महामारी का प्रकोप जल्दी खत्म हो।

सोमवार, 12 जुलाई 2021

पुस्तक समीक्षा : असफलता के प्रेरक सबक


साभार : दैनिक ट्रिब्यून

केवल तिवारी

लेखक शाम लाल मेहता की किताब ‘हार से आंखें मिलाना...’ असफलता से सबक सीखने को प्रेरित करती है। असफलता किसी और को उत्तरदायी ठहराने या खिसियाने के लिए नहीं है। उनकी किताब के दो-तीन प्रमुख प्रसंग देखिए ‘कोई भी बाधा इतनी समर्थ नहीं कि आत्मविश्वास के बढ़ते कदमों को रोक सके, और कोई भी पराजय इतनी बड़ी नहीं हो सकती जो निष्ठावान योद्धा का सिर झुका सके। हमारा भय ही असफलताओं का पोषण करके उनको शक्तिमान बनाता है।’ ऐसे ही एक अन्य जगह लिखा है, ‘असफलता ब्रह्मांड के किसी अज्ञात अंधेरे कोने से एकाएक टूट पड़ने वाली विपत्ति नहीं बल्कि प्रकृति के कारण और परिणाम के कालजयी स्थापित नियम के अंतर्गत मिलने वाला हमारे कार्यों का परिणाम है।’ दरअसल, महत्वपूर्ण बात यह भी है कि ‘आप जो पाना चाहते हैं वह कोरी कल्पना की बात न हो और पूरे विश्वास के साथ उसे पाने का प्रयास किया जाये, तभी सफलता मिलती है।’ शाम लाल मेहता की इस किताब में उदाहरणों के साथ बेहतरीन ढंग से समझाया गया है कि कैसे असफलता और सफलता के बीच तनिक-सा फासला होता है।

किताब में बीच-बीच में पंचतंत्र, वेदवाणी, महान विचारकों-चिंतकों के कोट्स को भी दिया गया है। लेखक ने एक रोचक अधिकार यानी ‘असफलता के अधिकार’ का भी जिक्र किया है। लेखक ने विभिन्न उदाहरणों के जरिये बताया है कि संघर्ष के बिना मिली सफलता घातक है। दृढ़ इच्छाशक्ति सर्वशक्तिमान है। किताब में समझाने की कोशिश की गयी है कि कठिनाइयां बाधक नहीं, साधक हैं।

पुस्तक : हार से आंखें मिलाना लेखक : शाम लाल मेहता प्रकाशक : आस्था प्रकाशन, नयी दिल्ली एवं सिरसा पृष्ठ : 143 मूल्य : रु. 195.

रविवार, 20 जून 2021

पापा तो पापा हैं

 


साभार : दैनिक ट्रिब्यून

बाहर से धीर गंभीर और सख्त। अंदर से बेहद मुलायम। ऐसे ही तो होते हैं ना पापा। कभी-कभी बच्चों के साथ बच्चे बन जाते, कभी डांट देते। कभी कड़वा बोलते, कभी बातों से शहद टपकाते। कभी जीवन का फलसफा समझाते और कभी अपने अनुभव से ‘जनरेशन गैप’ को भरते। कभी टीचर बनते, कभी दोस्त। कितना कुछ तो करते। कितने तो रूप धरते, लेकिन हर रूप में सबसे अहम, पिता का पिता बने रहना। किसी के लिए बापू, किसी के पापा दि ग्रेट, किसी के अब्बू जान और किसी के डैडी। फादर्स डे पर हर पिता को बधाई।


केवल तिवारी

दफ्तर से घर लौटता हूं तो बच्चों की मुस्कान सारी थकान दूर कर देती है, ऐसा कई बार आपने भी कहा होगा। अपने साथियों से भी सुना होगा। असल में ऐसी बात वो सब करते हैं जो बच्चों के साथ घुलमिलकर कभी अपना बचपन याद करते हैं तो कभी बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए उनको पढ़ाने में मशगूल रहते हैं। लेकिन इधर, दो सालों से तो सारा सिस्टम ही बिगड़ा हुआ है। ज्यादातर लोगों के लिए घर ही दफ्तर बना हुआ है और घर में बच्चों का कोहराम मचा हुआ है। बच्चे हैं तो हो-हल्ला होगा ही और बाहर की दुनिया ‘बंद’ है तो इसका मतलब यह थोड़े है कि भावनाओं का समुंदर भी हिलोरे नहीं मारेगा। अब इस विवाद में क्या पड़ना कि पिता के लिए कोई एक दिन नहीं होता या माता का कोई एक दिन नहीं होता। यह बिल्कुल सत्य वचन है कि माता-पिता का कोई एक दिन हो ही नहीं सकता, उनका साथ तो हमारी एक-एक सांस की तरह है। लेकिन अगर किसी एक दिन को विशेष तौर पर मनाते हैं तो उत्सव का माहौल तो बनता ही है। जब उत्सव सरीखा माहौल बने, जज्बात उमड़ें तो उस दिन को क्यों न उल्लासपूर्वक मनाया जाये। एक त्योहार की तरह। ऐसा ही हो रहा है। फादर्स डे के लिए भी तैयारियां चलीं। जिनके बच्चे छोटे हैं, वे पिता के लिए कार्ड बना रहे हैं, उनके लिए अच्छे संदेश बना रहे हैं। गाना गा रहे हैं, केक काट रहे हैं। जिनके बच्चे बड़े हैं, वे अपने तरीके से पिता से प्यार का इजहार कर रहे हैं और जिनके बच्चे दूर हैं वे पिता के लिए या तो ऑनलाइन गिफ्ट भेज रहे हैं या फिर पुरानी यादों को ताजा कर रहे हैं। इसलिए किसी भी खास दिन को मनाने से उत्सवधर्मिता तो बनती ही है। फिर यह तो ‘फादर्स डे’ है। पिता के प्रति प्यार जताने का दिन। जाहिर है पिता की भूमिका हमारे जीवन के हर पहलू के साथ बंधी है। बच्चे पिता की दिनभर की थकान को छूमंतर कर देते हैं, वही जब बड़े होते हैं तो ‘बहुत हो गया पापा, अब आप अपने लिए भी तो जीओ’, कहकर सारी खुशियां दे देते हैं। किसी भी बच्चे के लिए दुनिया में सबसे बेहतरीन व्यक्ति उसके पापा होते हैं और किसी भी व्यक्ति के लिए अनुभवों का खान भी उसके पिता ही होते हैं। छोटे हैं तो मजा आता है पिता के बचपन की बातें सुनने में, बड़े होते हैं तो उन्हीं बातों को अन्य लोगों के साथ साझा करने का आनंद ही कुछ और है, जिसकी शुरुआत ही होती है इस वाक्य से, ‘मेरे पापा कहते हैं...।’



बच्चों में खुद को देखता पिता

हिन्दी फिल्म अधिकार का गीत है-‘सूरज से किरणों का रिश्ता, सीप से मोती का। तेरा मेरा वो रिश्ता जो आंख से ज्योति का।’ सचमुच यही अटूट रिश्ता तो है बच्चों का पिता से। कभी मां शिकायत करती ये गुड़िया भी तुम्हारी तरह जिद्दी हो रही है। कभी परिवार का कोई सदस्य कहता ‘लड़का पूरी तरह अपने बाप पर गया है।’ कभी गुस्सा, कभी मनुहार, कभी नाराजगी और कभी प्यार। सचमुच ऐसे ही भाव तो होते हैं जब पिता और बच्चे आपस में घुल-मिल जाते हैं। पिता को भले ही उलाहनाएं मिलती हों, लेकिन असल में वह बच्चों में अपना ही बचपन देखता है। उक्त गीत की अगली पंक्तियों की मानिंद, जिसके बोल हैं-‘तू ही खिलौना, तू ही साथी तू ही यार मेरा, एक ये चेहरा, ये दो बाहें ये संसार मेरा। खुद को भी देखा है तुझमें तू मेरा दर्पण।’ अनेक लोग हैं जो इस बात को जाहिर करते हैं कि मैं अपने बच्चे में अपना बचपन देख रहा हूं। कुछ मन ही मन उन हरकतों को देखकर खुश होते हैं। कभी-कभी तो पिता जब सख्त बनकर बच्चों को डांटते हैं तो दादा-दादी की डांट उस पिता को ही पड़ने लगती है जिसमें बुजुर्ग कहते हैं, ‘भूल गया अपने दिनों को, कितना तंग करता था।’ पिता भले कुछ कहे नहीं, लेकिन वह बच्चों में खुद का बचपन देखकर गदगद तो हो ही जाता है।

पिता पर सवालों की झड़ी

‘फादर्स डे’ के दिन बेशक संदेशों का आदान-प्रदान होता हो, लेकिन सच तो यही है कि बदले वक्त में बच्चे पिता से सवाल दर सवाल दागते हैं। अनेक पिता होते हैं जो हंसते हुए कहते हैं, ‘हमारे जमाने में मजाल जो हम बाबूजी से कुछ पूछ लें। वह बहुत डांटते थे।’ डांटना-फटकारना तो पैरेंटिंग का हिस्सा है, लेकिन अब रूप थोड़ा बदल गया है। बच्चे शायद ज्यादा ‘स्मार्ट’ हो गये हैं। पिता शायद थोड़ा बदल गये हैं। लेकिन सच तो यही है कि पिता पर सवालों की झड़ी हमेशा से लगती आई है। सवाल उनके बचपन के दौर को लेकर, सवाल उनके जीवन संघर्ष के संबंध में, सवाल उनके स्वास्थ्य को लेकर, सवाल उनके खान-पान को लेकर, सवाल उनकी रुटीन लाइफ को लेकर और कई बार सवालों का भावुक ‘द एंड’ होता है जब बेटा कहता है, ‘पापा बहुत कर लिया संघर्ष, अब एंजॉय करो।’ बच्चे के ऐसे बोल सुनकर पिता को लगता है उसे सारे जहां की खुशियां मिल गयी हैं। बेटी हो या बेटा, अपने पिता के लिए हर कोई चिंतित रहता है। एक दौर में उन्हें पिता की गंभीरता का कारण समझ में आ जाता है। इसी समझ के दौर में वह अपने पिता को बच्चे की तरह ‘ट्रीट’ करने लगते हैं। पिता और संतान का यह रिश्ता होता अनूठा है। इसीलिए तो मां को धरती तो पिता को आकाश यानी छत्रछाया करने वाला बताया गया है।



इंटरनेट पर तैरते भावुक संदेश

जब मौका जश्न मनाने का है तो जाहिर है एक से बढ़कर एक सोशल मीडिया संदेश बनेंगे। आज तो इंटरनेट का संसार पिता के दिल जैसा ही व्यापक है। विस्तार लिए हुए। बेटा अगर सात समुंदर पार भी है तो पलभर में संदेश आ जाता है। हर दिन आते हैं प्यारभरे संदेश, लेकिन ‘फादर्स डे’ के लिए बने संदेशों की बात ही कुछ और है। ऐसे ही कुछ संदेश इंटरनेट की दुनिया में तैर रहे हैं। जैसे-‘मुझे रख दिया छांव में खुद जलते रहे धूप में, मैंने देखा है ऐसा एक फरिश्ता अपने पिता के रूप में।’- हैप्पी फादर्स डे। ऐसा ही एक अन्य संदेश है-‘अपने पापा को आज मैं क्या उपहार दूं, तोहफे दूं फूलों के या गुलाबों का हार दूं, मेरी जिंदगी में हैं वो सबसे प्यारे, उन पर तो मैं अपनी जान निसार दूं।’- हैप्पी फादर्स डे। एक अन्य भावुक संदेश है-‘संसार के सबसे भारी शब्द जिम्मेदारी को साक्षात देखें तो वह कैसा दिखेगा... पिता जैसा। पापा आप महान हो।’ – फादर्स डे की बधाई। एक अन्य संदेश है-‘मेरे खुदा तेरा शुक्रिया, मेरे खुदा तेरा करम, मेरे पापा की मोहब्बत सबसे बड़ी... यही दुआ कि रहे उस पर सदा तेरी रहम।’ एक और संदेश है- ‘दुनिया में केवल पिता ही एक ऐसा इंसान है जो चाहता है कि मेरे बच्चे मुझसे भी ज्यादा कामयाब हों। पापा तुस्सी ग्रेट हो।’ – हैप्पी फादर्स डे। एक संदेश के अल्फाज इस तरह से हैं- ‘पिता के बिना जिंदगी वीरान होती है, तन्हा सफर में हर राह सुनसान होती है। जिंदगी में पिता का होना बेहद जरूरी है, पिता गर साथ हो तो हर राह आसान होती है।’ – फादर्स डे मुबारक। एक और सुंदर संदेश है- मेरा साहस, मेरी इज्जत, मेरा सम्मान है पिता। मेरी ताकत, मेरी पूंजी, मेरी पहचान है पिता।’ – पापा लव यू।

कितनों ने खो दिया अपने पिता को

संसार चक्र में व्यक्ति अपना जीवन जीकर चला भी जाता है, लेकिन कोरोना महामारी ने अनेक लोगों को असमय ही छीन लिया। यूं तो अनेक लोग हैं जो अपने स्वर्गीय पिता को याद करते हैं। बच्चों के साथ उनकी यादों को साझा करते हैं। पिता का साया उठना तो निश्चित रूप से बेहद दुखदायी है, लेकिन भरपूर जीवन जीकर जाने पर मन को समझाया जा सकता है, पर महामारी के कारण आज अनेक बच्चों के सिर से पिता का साया उठ गया है। आइये इस मौके पर उनके भविष्य के लिए दुआ करें। उनकी यादों को भी साझा करें। जितना संभव हो मदद के लिए हाथ बढ़ायें। साथ ही कोशिश करें कि जब तक महामारी पूरी तरह खत्म नहीं होती, तब तक स्वास्थ्य संबंधी सुरक्षात्मक नियमों का पालन करें।


एक बिटिया की परिकल्पना थी फादर्स डे

यूं तो ‘फादर्स डे’ मनाने की शुरुआत को लेकर अब भी मतभेद हैं। खास तिथि पर ऐतराज करने वाले कहते हैं कि ‘पितृ दिवस’ उतना ही पुराना है जितना मानव इतिहास। बेशक बच्चों के प्रति पिता का प्यार और पिता के प्रति बच्चों के प्यार का कोई इतिहास या भूगोल नहीं हो सकता, लेकिन एक निश्चित तिथि के संबंध में अलग-अलग मत हैं। वैसे आज जिस रूप में हम ‘फादर्स डे’ मनाते हैं वह एक बिटिया की परिकल्पना थी। पिता ने जिस तरह उस बच्ची की परवरिश की, उसने मदर्स डे की तरह फादर्स डे मनाने के लिए अभियान छेड़ा। उसका अभियान रंग लाया और आज फादर्स डे दुनियाभर में मनाया जाता है। उस कहानी पर बात करने से पहले बात करते हैं निश्चित तिथि पर मतभेद के संबंध में। असल में कुछ इतिहासकारों का कहना है कि ‘फादर्स डे’ पहली बार 1908 में वर्जीनिया में मनाया गया था। वैसे इसका कोई प्रामाणिक आधार नहीं है, लेकिन प्रचलित कहानी के मुताबिक अमेरिका के वर्जीनिया राज्य में पहली बार 5 जुलाई, 1908 को उन 361 पुरुषों की याद में फादर्स डे मनाया गया था जिनकी मृत्यु एक कोयला खदान विस्फोट में दिसंबर 1907 में हुई थी। वैसे फादर्स डे मनाने की आधिकारिक मान्यता एक बिटिया के अभियान को मिली। इस संबंध में इतिहासकार कहते हैं कि सबसे पहले 19 जून, 1910 को ‘फादर्स डे’ मनाया गया। इससे पहले मदर्स डे की शुरुआत हो चुकी थी, इसलिए फादर्स डे को भी शुरू करने की परिकल्पना हुई। अब बात करते हैं उस बिटिया की जिसकी परिकल्पना थी फादर्स डे मनाने की। वह बच्ची अमेरिका की थी। निवास था वाशिंगटन के स्पोकेन शहर में। बच्ची का नाम था सोनोरा डॉड। असल में जब सोनोरा छोटी थी तो उसकी मां का निधन हो गया। उस समय सोनोरा डॉड के पिता विलियम स्मार्ट, जिन्होंने गृहयुद्ध के दौरान अपने देश के लिए महत्वपूर्ण योगदान दिया था, ने बच्चों की परवरिश की। उन्होंने सोनोरा और उसके अन्य भाई-बहनों की परवरिश दिलोजान से की। यानी विलियम स्मार्ट ने सोनोरा और अपने अन्य बच्चों को मां की कमी कभी खलने नहीं दी। बाद में विलियम का निधन हो गया। जब सोनोरा बड़ी हुई, तो उसने ‘मदर्स डे’ की तरह ‘फादर्स डे’ मनाने पर बल दिया। सोनोरा चाहती थीं कि उनकी पिता की पुण्यतिथि को फादर्स डे के तौर पर मनाया जाये। उन्हीं दिनों सोनोरा ने पिता के सम्मान में ‘फादर्स डे’ पहली बार मनाया। कहा जाता है कि सबसे पहला फादर्स डे 19 जून 1910 को मनाया गया। मां की तरह ही पिता के लिए खास दिवस मनाने के प्रस्ताव को वर्ष 1916 में अमेरिकी राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने स्वीकृति दी। बाद में 1924 में तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति कैल्विन ने फादर्स डे को आधिकारिक मंजूरी दे दी। उसके बाद वर्ष 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जानसन ने इसे जून महीने के तीसरे रविवार को मनाने की सहमति दी। वर्ष 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने पहली बार इस दिन को नियमित अवकाश के रूप में घोषित किया। उस समय से हर साल यह जून महीने के तीसरे रविवार को मनाया जाता है। अन्य खास दिनों की तरह ही यह उत्सव भी धीरे-धीरे पूरे संसार में मनाया जाने लगा। भारत में तो अनेक स्कूल छोटे बच्चों की प्रतियोगिताएं भी कराते हैं। चूंकि यह समय स्कूलों में छुट्टियों का होता है, इसलिए होलीडे होमवर्क में फादर्स डे पर कविता लिखने या ग्रीटिंग कार्ड बनाने का काम दिया जाता है। आज के दौर में चल रहे ऑनलाइन कक्षाओं के दौरान यह पर्व बच्चों और उनके अभिभावकों के साथ लाइव मनाया जा रहा है। इंटरनेट के जरिये अलग-अलग प्लेटफॉर्म से जुड़कर बच्चे इसकी तैयारी करते हैं। पिता के लिए कुछ खास करने के इस काम में माताएं पूरा सहयोग करती हैं।

पापा तो पापा हैं... https://m.dainiktribuneonline.com/news/features/papa-is-papa-50149

गुरुवार, 13 मई 2021

आहूं... बड़ा इतिहास समेटे एक गांव

 

पुस्तक का मुखपृष्ठ

 केवल तिवारी

आहूं से संबंधित कुछ बातें शुरू करूं उससे पहले मुझे याद आ रही है कुछ साल पहले हरियाणा के आईपीएस अधिकारी राजबीर देसवाल की एक किताब विमोचन से संबंधित कार्यक्रम की। उनकी किताब थी अंटा। मुझे हैरानी हुई। चूंकि मेरा असाइमेंट लगा हुआ था, कवरेज करने गया। पर मन में सवाल थे कि अंटा क्या है। वहां पहुंचकर देसवाल जी से छोटी सी मुलाकात हुई। उन्होंने बताया अंटा उनका पैतृक गांव है। लेकिन गांवों की कहानी सबकी एक जैसी ही होती है। फिर वह किताब देखी, वहां लोगों की चर्चाएं सुनीं तो लगा, खेत, खलिहान, दौड़-भाग, अपनापन गांवों में ऐसा ही तो होता है, हां भौगोलिक या ऐतिहासिक विवरण या परिस्थितियां थोड़ी अलग हो सकती हैं। बेशक वह किताब ऐतिहासिकता के बजाय संस्मराणात्मक शैली में ज्यादा थी। आज समय चक्र इतनी तेजी से बदला है कि गांवों से कई कारणों से अधिसंख्य जनता शहरों की ओर रुख कर चुकी है। शहर में तो हालात लगभग वैसे ही दिखते हैं जैसे किसी शायर ने लिखा है-

अपना ही शहर हम को बड़ा अजनबी लगा, अपने ही घर का हम को पता पूछना पड़ा।

लेखक शिव कुमार

खैर, लौटते हैं मूल मुद्दे पर। यानी ‘आहूं’ पर। सूचना मिली कि शिव कुमार जी की गांव के बारे में शोधपरक किताब प्रकाशित हो चुकी है। शिव कुमार जी से मेरी मुलाकात करीब दो साल पहले हुई। हरेश जी की बिटिया अपर्णा की शादी में। हरेश वशिष्ठ जी, हमारे (दैनिक ट्रिब्यून) के पूर्व समाचार संपादक। शिव कुमार जी हरेश जी के बहनोई हैं। बारात स्वागत से कुछ घंटे पूर्व हरेश जी के भाई जस्टिस शेखर जी और दैनिक ट्रिब्यून में हमारे साथी दीपक जी के साथ चर्चा हो रही थी। बातों-बातों में पुस्तकों को पढ़ने एवं उनकी समीक्षा पर चर्चा हुई। इसी दौरान शिव कुमार जी और दीदी से भी मुलाकात हुई। फिर तो बातों का सिलसिला चल पड़ा। उसी वक्त उन्होंने बताया कि वह अपने गांव के बारे में शोधपरक काम कर रहे हैं। किताब के रूप में वह जल्दी ही आएगी। मेरी उत्सुकता तभी से थी। अभी किताब पूरी पढ़ी नहीं, लेकिन जो थोड़ी-बहुत जानकारी मिली है, उसे देखकर लग रहा है कि किताब निस्संदेह रोचक होगी। बेशक मसला एक गांव का हो, लेकिन इसके तार बहुत दूर-दूर तक फैले होते हैं। फिर आहूं के तार तो पाकिस्तान तक जुड़े हैं। इसमें कोई शक भी नहीं कि गांव तो गांव ही होते हैं। उनका मूल स्वरूप कुछ इसी तरह का होता है-

पता अब तक नहीं बदला हमारा, वही घर है वही क़िस्सा हमारा।

गांव में लोग एक दूसरे को जानते हैं। इस गांव का भी यही हाल है। यह अलग बात है कि ऐतिहासिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण एवं प्राचीन होने के नाते इसकी जड़ें दूर-दूर तक जा पहुंची।

एक ही धरती हम सब का घर जितना तेरा उतना मेरा

दुख सुख का ये जंतर-मंतर जितना तेरा उतना मेरा

असल में आहूं कैथल जिले की पूण्डरी तहसील का एक गांव है। खुद में कैथल ही बहुत ऐतिहासिक इलाका है। दो साल पहले यहां भी जाना हुआ तो पता चला कि इसका पौराणिक नाम कपिस्थल है। यह नाम हनुमानजी के नाम पर पड़ा। बाद में यह कपिस्थल से अपभ्रंश होकर कैथल बन गया। खैर, कैथल के आहूं के ही मूल निवासी शिव कुमार ने अपने इस गाव के इतिहास पर पुस्तक लिखी है। कहा जा रहा है कि इस पुस्तक के प्रकाशित होने पर आहूं पहला गांव बन गया है जिसका लिखित इतिहास है। मैंने इस लेख की शुरुआत में जिस गांव का जिक्र किया था, वह असल में ऐतिहासिक दस्तावेज न होकर संस्मरणात्मक विवरण है। लेकिन आहूं ऐतिहासिक डॉक्यूमेंटेशन जैसा है। यह पुस्तक लेखक के लगभग पांच वर्षों के शोध का परिणाम है जिसके छपने की गांव के लोग बड़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे थे ।
281 पृष्ठ की इस पुस्तक में गांव के इतिहास के लगभग हर पहलू का वर्णन है।
 गांव का नाम कैसे पड़ा लेखक की यह खोज ऋग्वेद और पुराणों तक पहुंची है। लेखक का मत है कि गांव का नाम अहन नामक प्राचीन तीर्थ के नाम पर पड़ा है जिसकी पुष्टि में लेखक ने प्राचीन तथा नवीन कई ग्रंथों के सन्दर्भ भी दिए हैं। गांव कब बसा, गांव में बसी अलग जातियों और गांव आने वाले पूर्वजों के विवरण भी पुस्तक में दिए गए हैं। इस गांव में एक किला भी था तथा यह गांव लगभग सौ वर्ष तक एक सिख परिवार की जागीर रहा। गांव में मुसलमान राजपूत तथा अन्य कई जातियों के मुसलमान भी रहते थे जो आजादी के समय हुए बंटवारे में पाकिस्तान चले गए थे। पुस्तक में उनके बारे में विस्तार से वर्णन है तथा यह भी लिखा है की वे पाकिस्तान में कहां जा कर बसे हैं। इसके अलावा गांव के प्रशासन के पुराने नियम कायदे, जमीन से सम्बंधित मामले, गांव की आबादी, शिक्षा, स्वास्थ्य तथा गांव के विशेष लोगों पर भी अलग अलग अध्याय हैं। पुस्तक में गांव में हुई रुचिकर घटनाओं का भी बीच बीच में वर्णन है।

बताया गया है कि गांव में रहने वाले तथा वहां से आसपास के शहरों में बस गए हर परिवार को पुस्तक की एक प्रति दी जाएगी। वाकई गांव के बारे में ऐतिहासिक जानकारी से रू-ब-रू होना बहुत रुचिकर होगा। अब आते हैं लेखक के संक्षिप्त परिचय पर-
लेखक शिव कुमार के पिता धनी राम इस क्षेत्र के एक प्रतिष्ठित वैद्य रहे हैं और लेखक केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के पूर्व अधिकारी हैं। शिव कुमार जी का मानना है कि यह पुस्तक अपनी तरह की पहली पुस्तक है और इस में आहूं के अतिरिक्त आसपास के इलाक़े की भी ऐतिहासिक और अन्य महत्वपूर्ण जानकारियां हैं। लेखक ने गांव के इतिहास पर और अधिक शोध के सुझाव भी दिए हैं तथा गांव के इतिहास पर शोध के लगभग पांच साल के अपने अनुभव भी पुस्तक में ही सांझा किये हैं। लेखक ने गांव से पाकिस्तान चले गए राजपूत मुसलमानों के बारे में काफी विस्तार से लिखा है जिनके बारे में जानकारी प्राप्त करना आसान नहीं रहा होगा ।
लेखक का कहना है कि गांवों का इतिहास पूर्ण रूप से उपेक्षित रहा है जिसके बारे में कभी कोई शोध नहीं हुआ है। गांवों
 का इतिहास रुचिपूर्ण बातों से भरा होता है लेकिन उपेक्षा के कारण धीरे धीरे ख़त्म होता रहता है। गांवों के इतिहास में सबसे आकर्षक पहलू यह है कि इसमें अपने ही पूर्वजों तथा अपने ही स्थान का वर्णन होता है जिससे लोग सबसे अधिक जुड़ाव महसूस करते हैं। लेखक का मानना है कि यह पुस्तक गांवों के इतिहास लेखन की नयी परंपरा स्थापित करेगी। लेखक अब अपने परिवार के इतिहास तथा वंशावली पर भी काम कर रहे हैं। सचमुच काम बहुत रोचक हो रहा है। इससे प्रेरित होकर और लोग भी गांव और वंशों के बारे में कुछ शोधपरक काम करेंगे। सच में कुछ ऐसी-वैसी बातें भले कही जाएं लेकिन काम जारी रहना चाहिए बेशक लोग कहते रहें-

कोशिश के बावजूद ये इल्ज़ाम रह गया, हर काम में हमेशा कोई काम रह गया।

शिव कुमार जी को इस शोधपरक काम के लिए साधुवाद। कोरोना महामारी के दौर में आमने-सामने संवाद संभव नहीं, लेकिन उम्मीद है कि पुस्तक पर विभिन्न मंचों पर सार्थक चर्चा होती रहेगी। 
बुजुर्ग का साथ और हाथ में पुस्तक


मंगलवार, 16 मार्च 2021

भंवरे की गुंजन और बचपन की यादें

 केवल तिवारी

भंवरे की गुंजन है मेरा दिल, कब से संभाले रखा है दिल, तेरे लिए, तेरे लिए... इस धरती पर मेरे अवतरण से पहले बनी फिल्म कल आज और कल का यह गीत बहुत पहले से सुनता आया हूं। हसरत जयपुरी साहब के बोल और शंकर-जयकिशन का संगीत। आज अनायास ही फिर मुंह से फूट पड़ा। असल में घर के अंदर कहीं से एक भौंरा आ गया। छोटा सा। श्रीमती जी ने कहा, इसे बाहर कर दो। फिर आजकल ततैया भी खूब आ रही हैं। शायद यह मौसम उनकी ब्रीडिंग के लिए बहुत मुफीद होता है। भंवरे को बाहर करने उसके पास गया तो भ्रामरी योग में निकलने वाली आवाज सी आयी। धीरे-धीरे लगा अरे यह आवाज तो सुनी-सुनाई सी है। आज की नहीं, बहुत पहले की। शायद मैं तीसरी या चौथी में पढ़ता होऊंगा। या हो सकता है मैं चार-पांच साल का रहा होऊंगा। कालखंड सटीक याद नहीं है, हां गांव का नजारा था, यह अच्छी तरह याद है। गौर से सोचा तो याद आ ही गया वह दौर। गांव का। माता जी खेत में गयी होती थीं। दीदी या तो स्कूल या उन्हीं के साथ खेत में। मैं घर में अकेला होता था। बाहर के कमरे यानी चाख में ऐसा ही भौंरा या बड़ी मक्खी घूमती थी और उसकी भ्रमरगान मुझे उदासी से भर देता था। कभी खिड़की पर आकर बाहर को देखने लगता या फिर बाहर आ जाता। बाहर भी सन्नाटा सा पसरा दिखता। दिन में आराम करने का रिवाज होता था। कुछ लोग या तो घर में होते ही नहीं, होते तो आराम कर रहे होते। फिर हमारे जैसे बच्चों को कौन तवज्जो दे। खैर आज यह भौंरा आया, पत्नी ने बाहर करने को कहा तो मैं बचपन की बातें बताने लग गया। फिर मुझे लगा, पहले मुझे गीत गा लेना चाहिए था, 'भंवरे की गुंजन है मेरा दिल, कब से संभाले रखा है दिल तेरे लिए, तेरे लिए...' लेकिन क्या करें, यादों के पिटारे को सिर पर लादे फिरता हूं। याद आ गया वह मंजर। चलो इसी बहाने कुछ लिखने का मन हो गया और एक छोटा सा पीस यहां लिख डाला। 
और अंकल जी का कहना, खुश रहो तो वजन बढ़ेगा
बातों-बातों में एक रात पहले की बात याद आ गयी। अपने मित्रों के साथ कहीं गया था। वहां एक अंकल जी मिले। सरदार जी। बुजुर्ग, लेकिन सेहतमंद। वहीं हॉल के बाहर रखी वजन तोलने की मशीन थी। मैंने मित्र से कहा, 'यार मेरा वजन लगातार कम हो रहा है। हालांकि डॉक्टर ने ऐसे संकेत दिए हैं, लेकिन जब से जाड़ों के कपड़े उतर गये हैं कुछ ज्यादा ही दुबला दिखने लगा हूं।' मित्र ने कहा, वजन कुछ मेरा भी कम हुआ है। हम लोग बात ही कर ही रहे थे सरदार अंकल आ गये। मैंने और मित्र ने पूछा, 'अंकल वजन बढ़ाने के लिए क्या करें?' वे तुरंत बोले, 'खुश रहा करो, अच्छी गल किया करो, ऐहते दूजा कोई गल नहीं, वजन आपे बढ़ जावेगा।' मैं बोला, 'अंकल तुसी सच्ची गल कित्ता।' फिर हम सभी हंस पड़े, थोड़ा मेरी पंजाबी बोलने पर हंसना और थोड़ा अंकल की सही बात पर सहमति जताना। फिर मैंने और मित्रों ने कहा कि वास्तव में बात छोटी सी है, लेकिन असरदार। खुश रहना चाहिए। अच्छी बातें करनी चाहिए। शेष सब चलता रहता है। चलिए बातों बातों में कुछ बातें हो गयीं, बाकी फिर कभी---

वसुंधरा की वह यात्रा और जीवन पथ गुलाबी बाग से नोएडा-गाजियाबाद के सफर का जिक्र

केवल तिवारी

मुझे मोहब्बत है अपने हाथों की सब उंगलियों से, ना जाने कौन से उंगली पकड़ के मां ने मुझे चलना सिखाया होगा

यह शायरी याद आ गयी आज जब कुछ लिखने को जी चाहा। हर दिन हर पल कुछ लिखने को मन में कुलबुलाता रहता है, लेकिन दिल की ज्यादातर बातें डायरी में दर्ज कर लेता हूं, जो बात ज्यादा हिलोरें मारती हैं या जिस बात पर लगता है कि इसे तो सबके साथ साझा किया जाना चाहिए, उसे अपने ब्लॉग पर चस्पां कर देता हूं। डायरी लिखने की बात आई तो हमारे भतीजे साहब बिपिन ध्यान में आये। उन्होंने एक डायरी हाल ही में मुझे दी है। इत्तेफाक देखिये मेरी पुरानी डायरी अभी-अभी भरी है, अब नयी शुरुआत इसी में करूंगा। खैर... बिपिन तिवारी द्वारा दी गयी डायरी का किस्सा बहुत पुराना नहीं है, हाल ही में मैं दिल्ली गया था। गाजियाबाद भी जाना हुआ। बिपिन से बात हो गयी थी। बिपिन ने कहा कि पहले ग्रेटर नोएडा आ जाओ, हम सब लोग नितिन के साथ हैं, फिर चलेंगे वसुंधरा। मैंने वसुंधरा स्थित अपने फ्लैट में कुछ काम करवाया था, उसे देखना था और ठेकेदार को कुछ पैसा भी देना था। इस बीच, भतीजी भावना तिवारी यानी कन्नू से भी मिलने का कार्यक्रम था, लेकिन इत्तेफाक से उस दिन उसकी व्यस्तता थी। मैं समझ सकता हूं कि इलेक्ट्रानिक मीडिया की व्यस्तता। फिर जिम्मेदारी और तरक्की के पथ पर बढ़ते रहने के लिए थोड़ी भागदौड़। खैर मैंने परिवार के अन्य सदस्यों से बात नहीं की क्योंकि मैं जानता था कहीं भी मिलने नहीं जा पाऊंगा। हेम, हरीश, दीप, प्रकाश सभी तो दूर-दूर हैं। भतीजियों को घर भी अलग-अलग दिशाओं में है, फिर और लोग भी हैं। खैर अपने सफर के दूसरे पक्ष की ओर जाऊंगा तो मुद्दा भटक सा जाएगा। सीधे मुद्दे पर आता हूं। मैं अपने साले साहब भास्कर जोशी (राजू) के यहां फरीदाबाद पहुंचा, वहां से ग्रेटर नोएडा गया। पहले वरिष्ठ पत्रकार और मुझसे खास स्नेह रखने वाले नरेंद्र निर्मल जी के यहां गये। करीब एक घंटा वहां बैठने के बाद आ गया नितिन के फ्लैट (स्लीओ कंट्री, सेक्टर 121-नोएडा) 12वीं फ्लोर पर घर। वहां नितिन की नानी जी और मामाजी भी मिले। नितिन की मम्मी बीना, बहन मिन्नी और एक साल से तिवारी परिवार से जुड़ी नयी नवेली बहू मानसी मिलीं। बेहद सरल और सहज अंदाज में हुई बातें। मैं तो वाचाल किस्म का हूं, काफी कुछ बोल गया। नितिन ने कहा, बड़बाज्यू खाना बनने तक आइये नीचे घूम के आते हैं। हम लोग सोसायटी देखने चले गये। सचमुच एक नयी दुनिया सी। गगनचुंबी इमारत के ग्राउंड फ्लोर पर उतनी ही सुविधाएं। कुछ दिन पहले इसी इलाके में नितिन-मानसी की शादी की साल गिरह का जश्न मना था। उस समारोह में मैं नहीं था, खैर वह कमी आज पूरी हुई। मानसी के हाथ का खाना पहली बार खाया। बेहतरीन लगा। भले गगनचुंबी इमारत हो, भले आलीशान सुविधाएं हों, भले एक नया संसार सा हो, लेकिन सहजता वही पुरानी थी, सरलता वही पुरानी थी। मेरी भी और बाकी अन्य की भी। बातों-बातों में मानो हम कह रहे हों-

पता अब तक नहीं बदला हमारा, वही घर है वही क़िस्सा हमारा।

गुलाबी बाग फोटो : साभार इंटरनेट

दोपहर के भोजन के बाद मैं और बिपिन चले आये वसुंधरा, नितिन के मामा ने हमें वहां छोड़ दिया। इस बीच काफी बातें होती रहीं। पहले बिपिन के घर गये वहां कुछ देर आराम किया फिर चाय पी। उसके बाद मैं और बिपिन पैदल चल दिए मेरे फ्लैट की ओर। अनेक बातें हुईं और उन बातों का सार यही निकला कि-

रिश्तों को मजबूत बनाने के लिए, एक छोटा सा उसूल बनाते हैं। रोज कुछ अच्छा याद रखते हैं, और कुछ बुरा भूल जाते हैं

याद करने के इस क्रम में हम लोगों ने बात की गुलाबी बाग की। हमारे परिवार के एक हिस्से की बात हो और गुलाबी बाग का जिक्र न हो, कैसे हो सकता है। जिस तरह परिवार के दूसरे हिस्से की बात हो और लखनऊ तेलीबाग का जिक्र न हो, हो नहीं सकता, उसी तरह गुलाबी बाग का जिक्र तो स्वाभाविक था। गुलाबी बाग में भी 754 का। 754 वह नंबर है, जिसे हम तब से सुनते थे जब से हम शायद दिल्ली के बारे में भी सही से नहीं सुन पाए होंगे। मुझे याद है गांव से जब चिट्ठी लिखाई जाती थी तो कहा जाता था, बुद्धिबल्लभ तिवारी को मिले, 754 गुलाबी बाग-दिल्ली। बाद में मेरा भी उस घर में जाना हुआ। पुष्पा दीदी वहां कई महीने रही। मेरी माताजी वहां बहुत रहीं। हमारे परिवार का शायद ही कोई सदस्य होगा जो उस छोटे से घर 754 की विशालता और दीर्घता को न जानता हो। यह दीगर है कि नयी पीढ़ी के बच्चों ने सिर्फ सुना ही होगा। चूंकि जब से दिल्ली आया, बिपिन से नया रिश्ता भी बना, मित्रता का। बिपिन रिश्ते में भतीजा है, पूरा परिवार सम्मान देता है, लेकिन उम्र में तो बड़ा है ही। यहां मैं बिपिन के लिए इस तरह की शब्दावली लिख रहा हूं, लेकिन कभी बिपिन दंपती के लिए मुंह से तू-तड़ाक नहीं निकलता। आखिर मेरी लघुता में इतनी दीर्घता तो होना जरूरी है। खैर आते हैं चर्चा पर वापस। हम लोग अक्सर मिलते हैं। नहीं भी मिलते हैं तो परिवार के अन्य सदस्य किसी न किसी रूप में आपस में जुड़े हैं। सभी संस्कारी। हमारा परिवार है, इसलिए नहीं कह रहा हूं, बल्कि इस परिवार का उदाहरण दिया जाता है, इसलिए कह रहा हूं। क्योंकि-

अगर ज़िन्दगी एक सफर है तो परिवार उस सफर का सबसे सुन्दर हमसफ़र है।  

और इसलिए भी-

ऐ इंसानियत मेरी, मुझमें तुम बाकी रहना, परिवार को मुझमें, और मुझे परिवार में शामिल रखना।

पार्कव्यू सेक्टर 5 वसुंधरा फोटो : साभार इंटरनेट


चलिए बात जारी रखी जाये। नितिन के घर में जब हम सब बातें कर रहे थे तो सभी प्रसन्नचित्त दिख रहे थे। और इस बात को हम सब जानते हैं कि-

जिस परिवार में मां-बाप हंसते हैं, उसी घर में भगवान बसते हैं।

खैर 754 के बाद बिपिन ने गुलाबी बाग में दो मकान बदले। मुझे उनके नंबर ठीक से याद नहीं, लेकिन ग्राउंड फ्लोर के मकान में कई मौकों पर हम परिवार सहित मिले। एक शायद नितिन की जनेऊ के मौके पर और एक बार प्रेमा की शादी के मौके पर। वहीं दीप का भी घर है। अब प्रकाश भी उसी इलाके में अपने घर में रह रहा है। बड़ी प्रसन्नता होती है, यह सब सुनकर। 

सेक्टर 4 भी वसुंधरा।


खैर, चलना ही जिंदगी है। चलते-चलते और बातों बातों में पहुंच गया हूं वसुंधरा। यहां जब से बिपिन आया तो लगा अरे वाह अब तो पड़ोसी हो गये। उस दिन फिर बातचीत जारी रही। एक विचार आया कि-

इंसान आजकल इसलिए भी परेशान है, क्योंकि जो गर्मी रिश्तों में होनी चाहिए वो हमारे दिमाग़ में है।

हम लोग तो उस राह के राही हैं जिसके बारे में किसी शायर ने लिखा है-

अपनी गृहस्थी को कुछ इस तरह बचा लिया करो, कभी आंखें दिखा दी कभी सर झुका लिया करो।

फोटो : साभार इंटरनेट


रविवार के उस दिनभर की भागादौड़ी के बाद शाम को कुछ देर बैठकी हुई। बिपिन का बेहतरीन सौजन्य रहा। मेरे चार मित्र भी थे। विस्तार से उसकी क्या बात लिखनी। अपने इस यात्रा वृतांत को विराम देते हुए अंत में कहूंगा-

परिवार में कहना–सुनना आम है, बस लड़ाई के बाद सब भूल जाना आपका काम है।